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अंतर्द्वन्द

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shared Apr 17 in Poem by YUGESH KUMAR
अंतर्द्वन्द जो सीने में बसा
औचित्य जीवन का मैं सोचता
यहाँ हर कोई मुझे पहचानता है
मैं पर खुद में खुद को ढूंढता

साँस चलती हर घड़ी
प्रश्न उतने ही फूटते
जो सपने बनते हैं फलक पर
धरा पर आकर टूटते

कुंठित होकर मन मेरा
मुझसे है आकर पूछता
जिसने देखे सपने वो कौन था
और कौन तू है ये बता

रो-रो कर मुझसे बोलती है
मानव की ये त्रासदी
वो बनना चाहता है कुछ
और बन निकलता और कोई

कौतुहल विचारों में
एक शैलाब जिसे मैं रोकता
जो हारता न किसी और से है
वो बस स्वयँ से हारता

मझधार में कस्ती हमारी
एक सवाल हमसे पूछती
इस ठौर चलूँ उस ठौर चलूँ
मन को हमारे टटोलती

विचार कर जो एक तो
आज या कल मंज़िल को मैं पाउँगा
वरना यही मझधार है,कस्ती यही है
शायद अनचाही मंज़िल यही
कल मैं औरों को,खुद को
बस कोसता ही जाऊँगा/
-yugesh
commented Apr 27 by gurjyot_singh
nicely written...

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