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विलुप्त क्रांति

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shared Jul 9 in Poem by Hardeep Sabharwal
विलुप्त क्रांति

सिर्फ नस्लें ही
विलुप्त नही होती,
कई बार विलुप्त हो जाती है
क्रांतिया भी ,
जब नस्लें विलुप्त हो जाती है
तब शरीर मिट्टी में दब कर कहीं
छोड़ जाते है निशान कोई ,
जीवाश्म बन,
और जब
और क्रांतियां दफन हो जाती है
मन के गहराते नैराश्य में ,
वे छोड़ जाते है,
दूर तक रिक्तता और अवसाद
और अट्टाहास करते जुल्म,
लेकिन एक नस्ल का स्थान लेने
ज्यूं नऐ जीव आ जाते है
क्रांतियां भी फिर आऐगीं
नये प्रतीको में ढल कर
और दावानल सी लील लेगीं
तमाम अन्याय के जंगलो को ,
बस एक चिंगारी पैदा होने की जरूरत है.

© हरदीप सबरवाल.
commented Jul 10 by gurjyot_singh
superb lines...
commented Jul 11 by Hardeep Sabharwal
Thank you so much Gurjyot ji
commented Sep 1 by Priya Batra
superb Hardeep Sir :)
commented Sep 8 by Sprakhar
बहुत खूब यकीनन
commented Sep 12 by Shruti Singh
It's amazing
commented Sep 12 by Hardeep Sabharwal
Thank you so much every one
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