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माँ सब जानती है

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shared Sep 13 in Poem by Pratik13
मैं कहता नहीं जुबान से 
पर वह समझ जाती है, 

जानती है हर झूठ को मेरे 
फिर भी सच मानती है. 

माँ है मेरी 
वह सब जानती है. 



अपने हिस्से की रोटी भी
मुझको वह खिलाती है, 

मेरी छोटी बातों पर भी
वह खूब खिल-खिलाती है 

माँ है मेरी 
वह सब जानती है. 



कभी पिता, कभी भाई, 
कभी दोस्त बन जाती है, 

मुझको सारी खुशियां 
बिन मांगे मिल जाती है. 

माँ है मेरी 
वह सब जानती है. 



अगर ना पहुँचू, वक्त पे घर, 
नींद उसकी भी उड़ जाती है,  

देख के मुझको परेशानी में  
वह खुद परेशान हो जाती है, 

माँ है मेरी 
वह सब जानती है. 



गिरता हू बार बार मैं
वह हर बार उठाती है, 

कोशिशें हो नाकाम 
फिर भी पीठ थपथपाती है. 

माँ है मेरी 
वह सब जानती है. 



फेरके सिर पर हाथ मेरे 
गोद में मुझको सुलाती है,

मेरी सारी उलझने, 
फिर यूँही सुलझ जाती है. 

माँ है मेरी 
वह सब जानती है.
commented Sep 13 by Priya Batra
beautiful....loved it!
commented Sep 13 by Pratik13
Thank you Priya, your comments inspires one to write.
commented Sep 15 by gurjyot_singh
lovely poem... loved every line of it...
commented Sep 15 by Pratik13
Thanks Gurjyot bhai. Loved every word of your comments
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