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किनारो पर आघात करकर लहरो ने पूंछा,
दम भरते हो हमे बांधने का , रोकने का , जान ने का,
पर तुम स्वयं ही बंधे हो , सीमा में हो , बेड़ियो में पड़े हो ,
न स्वतंत्र हो जाने को , न स्वछन्द हो खुशिया मानाने को ,
फिर क्यों ये ही शोर हर तरफ है , क्यों तुम्हारी वाह वाह है ,
क्यों तुमपर लोग आश्रित हैं क्यों तुम्हे महान बताते हैं ,
किनारा धीरे से मुस्काया ; आसमान को देखा और हल्का सा हिला ,
उसपर जो चोट सा पेड़ था , वो घबराया ..बोला ..."गिरा गिरा गिरा ".
देख ओ स्वतंत्र लहर , मेरे ठहराव से ही इसका बसेरा अडिग है,
मैं ही l भी जाऊ तो ये घबरा जाते हैं ,
मन तू स्वतंत्र है , अंत हीं है . पर बंधी तो मुझसे हुई है,
और तुझपर जो जहाज सफर करते हैं ...तो तुझसे प्रति पल झगड़ते हैं 
उस द्वन्द को लोग यात्रा कहत हैं...पर वो जहाज तुझपर नहीं तेरे गुरुर पर बहते हैं,
मेरा स्वाभाव ही लोगो को आश्रय देने का है, सहने का है,,
उर तेरा स्वभाव भागना ..दौड़ना ...बहना है ,
तू भले ही कितनी भी ताकतवर क्यों न हो , जहाजः तुझपर से गुजर जाएँगी, 
और मैं भले ही शांत , ठहरा हु , वो सब मिलने मुझसे ही आएंगी . ..

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superb lines...
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super amazing....
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Thanks Priya !
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thanks Gurjyot  !

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shared Dec 21, 2015 in Poem by imuprince
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