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किस्मत को कोसने को तो पूरी ज़िन्दगी पडी है
सब्र-औ-हिम्मत रख़ के सामने मंज़िल ख़डी है

करीब आ रही है वो कदम-दर-कदम तेरे
भले तुझे लगे के अभी दूर बडी है

कुछ तो कमी होगी तेरी कौशिशों में, ए दोस्त
के यूं नही मंज़िल भी ज़िद्ध पे अडी है

पा ही जाओगे, एक न एक दिन उसे
मैंने देखा, इस कदर तुम्हारी उस पे नज़र गडी है

तोडेगा उसके गुरूर को तू बा-बेरहम
अनिल' ज़िद्ध आज तेरी भी ज़िद्ध पे ही अडी है

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