Welcome to YoAlfaaz, it's your personal online diary and a writer’s community to Share Your Feelings in words. Write, learn, socialise, get feedback, get exposure and improve reputation by being active on YoAlfaaz.  You can start by Registering here. For any query visist F.A.Q.
Competition for Best Short Story of the month is going on, if you are interested then check the guidelines.
+4 votes
25 views
shared in Poem by
-: पीपल की छाव में:-

शहर से सुदूर
मेरे गांव के तालाब के
महाड़ में लगा
एक पीपल का पेड़

ग्रीष्मकालीन ताप से
जलता शरीर निढाल
लेट जाता पत्तों के
सरसराहट मधुर ध्वनि में

अलौकिक चिर निन्द्रा में
विचरण करता भौतिक विचार
प्रकृति के गोद में पाकर
खुद को अल्हादित होता
बचपन का बेफिक्र मन

खेत में काम करते मजदूर
अल्पाहार करने झुंड में आना
पीपल की छाव में
शीतल हो पुन: लौटना

अपनत्व सजीव रिश्ता
कभी दूर नहीं जाने की चाह
तरसता है आज व्याकुल चित
शहर के बनावटी संबंन्धों में

सुधन चाचा का लगाया
पीपल का वृक्ष आज भी है
नहीं है आज वह और मेरा बचपन
आपसी प्रेम की छाया तले

लौटने को उद्विग्न उर
लिपट जाने को वही तरु
बीते वक्त को समेट लेना
आगोश में फिर पनाह लेकर

गोधूलि की वेला में
गायों बछड़ौं का अल्हड़ झुंड
धूल धूसरित चरवाहो की मस्ती
लालायित नयन देखने को दृश्य ....
         
                       प्रकाश यादव "निर्भीक"
                        नोयडा - 12-05-2017
commented by
beautifully written... :)

Related posts

+5 votes
0 replies 29 views
+2 votes
0 replies 36 views
+4 votes
0 replies 22 views
Connect with us:
...