Welcome to YoAlfaaz, it's your personal online diary and a writer’s community to Share Your Feelings in words. Write, learn, socialise, get feedback, get exposure and improve reputation by being active on YoAlfaaz.  You can start by Registering here. For any query visist F.A.Q.
+2 votes
17 views
shared in Poem by

उपजाऊ आंगन।। ************** मैं मेरे भीतर , और कई ऐसी कवितायेँ हैं। जो मैं को मैं से गुणा करके , विभाजित ही करती है मुझे, मेरी तन्हाइयो से। जब जब मैं मुझ सी 'कई' जाती हूं, रेशम बिखर जाता है, मेरी ईंटों की ईमारत में। और बन जाता है एक हरा आँगन , सिमट जाता है वर्तमान, और पसर जाता है भूत, रोक कर भविष्य के किवाड़ को। तब होता है वही पुराना शहर। ******** जब मैं मुझ में कई हो कर ढह जाती हूं, अपनी ही नींव पर , पर तुम ना देखना मेरी हार, मेरा पड़ाव ,समय के परे, मेरा पतन। ये रुका भूत छलावा है, समय की कनखियों से, भविष्य चल रहा है। और मैं फिर से उठुंगी, नींव के भीतर से संचार होगा , नये काल का। क्योंकि मैं एक नही हूं क्योंकि तुम नही देख सकते, मेरा विस्तार , मेरा उपजाऊ धरातल जो ऊगा देता है मुझ में मैं , और मै से हम । मैं बढ़ रही हूं, रुके समय की काई पर, उग रही हूं खरपतवार सी, बिन सामाजिक खाद । परिवर्तन की चाह में। अपने आप में अपनी सी उन्नति, अपनी ही नयी उत्पत्ति। कविता वर्मा। 9:13pm 20जून।

commented ago by
gajab nice poetry...
commented ago by
amazing...!!! dii....so lovely words

Related posts

+3 votes
0 replies 18 views
+5 votes
0 replies 37 views
+2 votes
0 replies 14 views
+1 vote
0 replies 7 views
+2 votes
0 replies 18 views
+5 votes
0 replies 20 views
+4 votes
0 replies 12 views
+5 votes
0 replies 51 views
Connect with us:
...